रवि मुझे बहुत प्यार करते है / पति होने की सारी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते है / कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी / हमारे बीच काफी मधुर संबध भी रहे है अगर कुछ छिटपुट पारिवारिक झगड़ो को छोड़ दे तो , और उसका कारण भी मैं ही बनती हु/ तो कहा जा सकता है ठीक -ठाक वैवाहिक जिंदगी चल रही है / मेरा जरुरत से ज्यादा उनको फ़ोन करना , उनका फ़ोन बिजी आने पर बेवजह शक करना कि उनका अफेयर ऑफिस की उनकी सेक्रेटरी से चल रहा है ही मुख्यता हमारी लड़ाई का कारण है / वैसे मैं भी जानती हू वो एकदम सीधे-साधे पति है जो परम्पराओ का सम्मान करते हुए मेरे वजह -बे वजह मुह फूलाने पर प्यार से पुचकारते है, दुलारते है , अपने हाथ से खिलाते है , उनसे बात करना बंद कर दू तो असहाय से मेरे पास भटकते रहते है कि कब श्रीमती की अनुकम्पा प्राप्त हो और सब कुछ सामान्य हो जाये / मैं भी जानती हू की अमूमन गलती मेरी ही होती है लेकिन एक दीन- हीन पुरुष पर गरजना , उसको सजा देना , अपने खोखले अहम् की संतुष्टी के लिए उसका शोषण करना जायज नहीं , खास कर ऐसे व्यक्ति के साथ जिसके साथ मैंने सात फेरे लिए और उसके आदेशो का हमेशा पालन कर उसे खुश रखने का जग- समाज को आश्वाशन दिया / लेकिन , दिल से कहू तो मुझे रवि को अपने सामने मिमयाते हुए , दुम हिलाते हुए काफी अच्छा लगता है /
कॉलोनी में मिसेज गुप्ता से जब अपनी हुंकार की बातें बताती हू तो सही मायने में मह्सूश होता है की भारत की औरतो को स्थिति सोचनीय हो सकती है लेकिन जिन- जिन का पति "रवि" जैसा है वो तो कम से कम शसक्त हो ही गयी है / इन् सब के बावजूद ,यह एक सत्य है की रवि मुझे बेहद प्यार करता है ,नहीं तो वो मेरे नाज -नखरे नहीं ढोता / रवि के प्यार की निशानी है -"आराध्य', हमारा बेटा, अभी दो साल का है / लेकिन क्या मैं भी रवि को उतना ही प्यार करती ही ?????????? कभी सोचा ही नहीं , यह प्रश्न बार बार मेरे मन में आया और हर बार मुझे 'चन्दर ' का ख्याल आया / शायद् स्वीकार नहीं करना चाहती हू कि रवि से तो मैंने कभी प्यार किया ही नहीं , वो तो केवल जीवन का एक समझौता है जिसे सामाजिक साहुकारो ने मुझ पर थोप दिया , उसके साथ तो बस जिंदगी काट रही हू , शायद इस लिए भी की अब् कोई विकल्प नहीं बचा / यही कारण है रवि को केवल और केवल पति के रूप में स्वीकार किया है और कमोबेश एक पत्नी की भूमिका भी निभा रही हू , उससे शायद भ्रम भी हो की मैं उसे बहुत प्यार करती हू , लेकिन क्या वाकई में ऐसा है ?????नहीं मालुम , लेकिन इतना जानती हू "चंदर " ही मेरा प्यार था और है और रहेगा /
तो रवि को मैं धोखा दे रही हू / तो मैंने अपना शरीर केवल रवि को सौपा है और मन तो चन्दर के पास है / तो रवि को बार बार क्यों फ़ोन करती हू , मुझे थोडा भी इगनोरे करता है तो गुस्सा दिखाती हू / जब रवि के साथ अन्तरंग पलो में उसका सहयोग करती हु तो कभी चनदर ख्याल की परिधि में नहीं आता / अगर मेरा पहला प्यार चंदर है , वही चंदर जिसके लिए मैं सब कुछ छोडने को तैयार थी ,हाँ हर वो चीज जो मुझे बहुत प्यारी थी उसके सामने छोटी थी कैसे कुछ- कुछ पलो के लिए जब मैं रवि की बाँहों में उसे उत्साहित हो चूमती हु और उसमे समां जाती हु चनदर को बिलकुल याद नहीं करती /जब से वह मेरी जिंदगी से गया है मेरी यादों में वो हमेशा भटकता ही रहा है , लेकिन उस पल मुझे क्या हो जाता है / अपनी सुध -बुध खो बैठती हू / दुनिया में सबसे प्यारा मुझे रवि लगने लगता है / जिसे हमेसा चंदर से हर दृष्टी में मैं छोटा समझती रहती हू वो अचानक दुनिया का सबसे श्रेष्ट पुरुष प्रतीत होता है , हाँ, चंदर से भी बेहतर / लेकिन , जब शरिर में आया तूफ़ान सँभलते हुए साहिल पर पटखनी खा लेता है , सब कुछ शून्य में चला जाता है तब मुझे दूर खड़ा बाहें पसारे लाल सूरज में आधा छिपा हुआ चंदर दिखाई देता है - बुलाता हुआ , याद दिलाता हुआ की मेरे जीवन का उद्देश्य तो सिर्फ वही है , इस शरीर , इस मन पर स्वामित्व तो केवल उसका ही है /और, मैं तब तक ग्लानि बोध से व्याकुल हो उठती हू , अपराध बोध मुझे तब तक बेचैन रखता है जब तक फिर से मैं शारिरीक महत्कांक्षओं की पूर्ति के के लिए रवि की गिरफ्त में नहीं आ जाती /
ऐसा क्यों होता है नहीं जानती और जानना भी नहीं चाहती / खुद से वादा करतीं हू कि अब मुझे अपने उभरते जजबातों को समित करना है , रवि से दूरी बनानी है मुझे , ये सब कुछ तो चंदर का है , रवि का क्या हक बनता है , जो कुछ लेना था वो ले चूका है , अब तो मैं अपने आप को संभाल के रखू चंदर के लिए ,उसके पावन प्रेम के लिए , अपने स्वार्थ के लिए मैं अपने प्रेम की बलि नहीं दे सकती ,लेकिन एक पल के लिए ख्याल आता है ,अब तो चंदर मुझे हासिल नहीं तो मैं अपनी जिंदगी की रोचकता को क्यों जानबूझ कर खो दू और इसी जद्दोजहद में मेरा प्रण टूट जाता है और फिर संभाल नहीं पति खुद को , पिसलती चली जाती हू उसके बाँहों में और वो मुझे अपने सख्त पकड़ से संभाल लेता है और फिर मुझे अपराध -बोध होता है , ये सिलसिला तब से चल रहा है जबसे रवि मुझे ब्याह कर लाया है /..............................................जारी है ..............................